किताब : 'कविता के विरुद्ध एवं अन्य कविताएँ'(योगेंद्र कृष्णा)
● शहंशाह आलम/ मनुष्य होने के कितने काल-खंड बीत चुके। उसी तरह कविता के काल-खंड भी बीतते रहे हैं। इन बीत रहे काल-खंडों में से मनुष्यता के भीतर रची-बसी कविता और कविता के भीतर रची-बसी मनुष्यता की पड़ताल की जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि एक अच्छा मनुष्य होने के लिए जीवन में मनुष्यता के साथ-साथ कविता बेहद ज़रूरी है। एक मनुष्य अपनी मनुष्यता के बचाव में कितनी-कितनी यातनाएँ सहता है। मेरे ख़्याल से, अपनी यातनाओं को व्यक्त करने का सबसे कारगर माध्यम, कविता है। योगेंद्र कृष्णा एक ऐसे कवि हैं, जो वर्तमान समय में सह रहे, जूझ रहे, तड़प रहे मनुष्य को अपनी कविता के बहाने नई आवाज़ दे रहे हैं। इनकी सद्य प्रकाशित कविता की किताब 'कविता जे विरुद्ध एवं अन्य कविताएँ' की कविताएँ इन्हीं बातों का ख़ुलासा करती हैं। यह सच है कि यह मनुष्य के ध्वंस का समय है। एक ईमानदार मनुष्य के लिए यह समय जितना असहिष्णु साबित हो रहा है, ऐसा पहले शायद ही रहा हो। यह मनुष्य के इतिहास को जान-समझकर हम कह ही सकते हैं। आज का मनुष्य जितना हताश दिखाई देता है, पहले का मनुष्य शायद ही इतना हताश रहा हो। आज का मनुष्य अपने से कमज़ोर मनुष्य को देखना कहाँ चाहता है :रेत पर बिखर पड़े अवशिष्ट / अनाम सैलानियों के ही नहीं / समुद्र और कई-कई और भी / अनाम चीज़ों और रिश्तों
के ठौर बताते हैं / माचिस की अधजली तीलियाँ / बताती हैं कि अधजले / सिगरेट के टुकड़े भी ज़रूर / यहीं कहीं
पास हैं / वे बताते हैं कि / अवशिष्टों के आपसी रिश्ते / आदमी के रिश्तों से भी कहीं / अधिक गहरे और ख़ास हैं /
कि सिगरेट के डब्बे / और बीयर कैन या बोतलों / के बीच रिश्तों की अहमियत / किसी और के लिए / ख़ाली हो
जाने में है / जैसे एक भरा-पूरा आदमी / दूसरे भरे-पूरे आदमी से / कभी वैसे नहीं जुड़ता / जैसे एक ख़ाली आदमी /
दूसरे ख़ाली आदमी से / कोई ख़ाली चीज़ / दूसरी ख़ाली चीज़ से / जैसे जुड़ती है एक ख़ाली जगह / साँय-साँय हवा
के साथ / दूसरी ख़ाली जगह से / फिर ख़ाली जगहें / या ख़ाली आदमी दरअसल / उतने भी ख़ाली नहीं / जितने कि
वे / भरे-पूरे आदमी को दिखते हैं / लेकिन कितना अद्भुत है / ख़ाली चीज़ों के साथ / ख़ाली आदमी का रिश्ता / भरा
-पूरा एक आदमी / भरी-पूरी किसी चीज़ को / सिर्फ़ ख़ाली कर सकता है / ख़ाली आदमी / ख़ाली चीज़ों को / सिर्फ़
भरता है / और उसे भरने में / ख़ुद और भी / ख़ाली हो जाता है / लेकिन हर ख़ाली चीज़ / उन्मुक्त होती है / कई-
कई बंधनों और गिरफ़्त से / जैसे कि हमेशा के लिए मुक्त होता है / पीने के बाद छोड़ दिया गया / सिगरेट का कोई
अधजला टुकड़ा / दो अनाम होंठों या दो उँगलियों / के बीच की गिरफ़्त से / लेकिन ख़बरदार / कि अब ख़ाली
जगहों / ख़ाली आदमी और उनके / अटूट रिश्तों पर / उनकी छोटी-छोटी ख़ुशियाँ / आँसुओं और शोक पर भी /
चौकन्नी नज़र है / भरे-पूरे आदमी की / कि वह भर देना चाहता है / दुनिया भर के नए-नए कचरों से / तमाम ख़ाली
जगहों / और ख़ाली आदमी को / दरअसल हर आदमी पर / उसकी नज़र है / क्या ख़ाली क्या भरा है / क्या ज़िंदा
क्या मरा है / हर उस जंगल / जो अब तक हरा है / हर उस पहाड़ / जो अब तक खड़ा है / समुद्र की हर बूँद /
रेगिस्तान की हर रेत / और बंजर या फ़सलों से / लहलहाते हर खेत / पर उसकी नज़र है ( 'ख़ाली आदमी और
ख़ाली चीज़ें', पृ.10-13 )।
योगेंद्र कृष्णा की कविताओं के बिंब स्वत: बोलते-बतियाते हैं। इन बिंबों का बोलना-बतियाना दरअसल एक आदमी का बोलना-बतियाना है। योगेंद्र कृष्णा की कविताओं की तह तक जाने के लिए ज़रूरी है कि समकालीन कविता की जो अपनी एक महीन आवाज़ है, उस आवाज़ को उनकी कविताओं का पाठ करते हुए बेहद सतर्कता से अपने ज़ेहन में पकड़े रखना होता है। ऐसा नहीं करने से शायद कविता का सही अर्थ उलट जाए। इसलिए कि योगेंद्र कृष्णा आज की अनैतिक व्यवस्था पर चोट इतनी महीनी से करते हैं कि हम उस चोट, उस प्रहार, उस उपहास को समझ नहीं पाते। ऐसा इसलिए होता है कि कविता विपक्ष की भूमिका में होती है, परंतु किसी राजनीति करने वाले प्रवक्ता की तरह नहीं। योगेंद्र कृष्णा की कविताएँ ऐसी ही हैं। उनकी कविताओं की थाह लेने के लिए ज़रूरी यह भी है कि हमें कविता के तल तक पहुँचना होता है, तभी उनकी कविताओं की थाह हम ले पाते हैं। उनकी कविता की गहराई आप इन पंक्तियों में ढूँढ़ सकते हैं, जहाँ वे किसी कला फ़िल्म के नायक की भूमिका में अपने कविता के नायकों से पूछते हैं, 'तब तक उन्हें इतिहास और अतीत के / तिलिस्म में भटकाओ / नरमी से पूछो उनसे / क्या दान्ते की कविताएँ / विश्वयुद्ध की भयावहता और / यातनाओं को कर सकीं / क्या गेटे नाज़ियों की क्रूरताओं पर / कभी भारी पड़े / फिर भी यक़ीन न हो / तो कहो पूछ लें ख़ुद / जीन अमेरी, प्रीमो लेवी या रुथ क्लगर से... / ताद्युश बोरोवस्की, कॉरडेलिया एडवार्डसन या नीको रॉस्ट से / कि अॉश्वित्ज़, बिरकेनाऊ, बुखेनवाल्ड या डखाऊ के / भयावह यातना-शिविरों में / कविता कितनी मददगार थी / कवि ऑडेन से कहो / लुई मैकनीस से कहो / वर्डसवर्थ और कीट्स से कहो / कि कविता के बारे में / उनकी स्थापनाएँ कितनी युगांतकारी हैं ( 'कविता के विरुद्ध', पृ.8-9 )। कविता पर कवि का यह अभियोग, कवि का यह व्यंग्य, कवि का यह आक्षेप कविता के प्रदेश को भयाक्रान्त नहीं करता बल्कि इस प्रदेश को सहज करने में सहायक सिद्ध होता है :
मैं तुम्हें केवल / कुछ शब्द सौंप सकता हूँ / तुम चाहो तो इनसे / अपने जीवन में चारों तरफ़ / ज़मीन से आसमान
तक / जीवंत और उदात्त / कोई मंज़र गढ़ लो / या फिर अपने ही भीतर / उतरने के लिए ज़रूरी / हौसला और
संगीत रच लो / तुम चाहो तो / इन शब्दों को / लाचार या बेबसों / का हथियार हो जाने दो / या फिर / मृत-शय्या
पर लेटे / उस आदमी की अंतिम / साँस हो जाने दो / गलियों सड़कों पर / चाहो तो इन्हें / आमजन की भाषा / या
प्रतिरोध में बजने दो / लेकिन किसी के इशारे पर / कभी इन शब्दों से / अपने ही होंठ मत सिलने दो ( 'केवल कुछ
शब्द', पृ.30-31 )।
योगेंद्र कृष्णा का यह कविता-संग्रह समकालीन कविता के लिए विशिष्ट है, नायाब है, रेतीली भूमि में हरे पेड़ की तरह है। ये उन आत्मानुभूति की कविताएँ हैं, जब कोई कवि अपने को इस पूरी दुनिया का कवि मानते हुए रच रहा होता है। इन कविताओं की आत्माएँ अपने पाठकों चौंकाने का उद्यम न करते हुए सीधे इस दुनिया के देवताओं और ईश्वरों पर चोट करती हैं। इन कविताओं में कवि अपने भीतर छिपी विपक्ष की मज़बूत जड़ों को पकड़कर रखता है और हत्यारों, भ्रष्टाचारियों, तानाशाहों से मुक्ति के लिए विद्रोह का रास्ता उन आदमियों के लिए बनाता चलता है, जो हत्यारों, भ्रष्टाचारियों, तानाशाहों के शिकार बनते रहे हैं। संग्रह की 'हत्यारे जब मसीहा होते हैं', 'हत्यारे जब गांधी होते हैं', 'सभ्यता का आतंक', 'जंगल और पहाड़ होना चाहता हूँ', 'बंद होती खिड़कियाँ', 'ख़ाली जगहें', 'सुख की ये चिंदियाँ', 'और भी है घास', 'शायद पता हो मधुमक्खियों
को', 'रीढ़', 'सहगामिनी परछाइयाँ', 'मुर्दा पाया गया हूँ', 'ग़ैब की भाषा', 'ठिठक जाता हूँ', 'तुम्हारा होना' आदि कविताएँ हमें आश्वस्त करती हैं कि ये कविताएँ हमारे बुरे, कठिन, हारने के वक़्त काम आएँगी। योगेंद्र कृष्णा की कविताओं का आयतन बड़ा, बहुत बड़ा है। उनकी कविता का यह आयतन आगे बड़ा और बड़ा होगा, यह मेरा नहीं, एक कवि का आत्मविश्वास कहता है। इसलिए कि योगेंद्र कृष्णा की कविताएँ तोड़-फोड़ की बजाय अपने सराकारों को नई धार देने में अत्यधिक ध्यान देती हैं :
सच को मैंने अब तक
ग़लत सिरे से पकड़ रखा था
इसलिए फ़िसल गया एक दिन
मेरे हाथ से
और तभी मैंने जाना
हर सच का
एक ओर होता है
और एक छोर भी ( 'सच का ओर-छोर', पृ.83 )।
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कविता के विरुद्ध एवं अन्य कविताएँ ( कविता-संग्रह ) / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ़-77, सेक्टर-9, रोड नं.11, करतारपुर इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006 / मोबाइल संपर्क : 09835070164, 09829018087 / मूल्य :Rs.100
कविता के विरुद्ध एवं अन्य कविताएँ ( कविता-संग्रह ) / प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ़-77, सेक्टर-9, रोड नं.11, करतारपुर इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006 / मोबाइल संपर्क : 09835070164, 09829018087 / मूल्य :Rs.100
समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, हुसैन कॉलोनी, नोहसा बाग़ीचा, नोहसा रोड, पेट्रोल पाइप लेन के नज़दीक, फुलवारीशरीफ़, पटना-801505, बिहार / मोबाइल : 09836417537
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