सोमवार, 2 जनवरी 2017

किसानों की आत्मनिर्भरता के लिए उठाने होंगे कदम

-स्वामी अग्निवेश/ कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर नोटबंदी योजना से कालेधन के रूप में सरकार के पास आए धन से किसानों के कर्जे माफ करने और बिजली बिल आधे करने की बात कर उत्तर प्रदेश चुनाव में किसान कार्ड खेला है। किसान कर्जा माफी में राहुल गांधी ने कर्जे के बोझ तले दबकर किसानों का  आत्महत्या करने  का तर्क दिया है। प्रधानमंत्री से मिलने गए राहुल गांधी आने साथ कांग्रेस के कई प्रदेश के प्रभारी भी लेकर गए थे, जिन्होंने अपने-अपने प्रदेश के किसानों की दुर्दशा से प्रधानमंत्री को अवगत कराया। राजनीति के माहिर खिलाड़ी नरेंद्र मोदी ने इन सबकी बातें तो सुनी पर कर्जा माफी का कोई आश्वासन नहीं दिया। दरअसल कांग्रेस को लग रहा है कि इन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री किसानों का कर्ज माफ कर सकते हैं। कांग्रेस किसानों की समस्याओं के मामले में दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहती है। यदि कर्ज माफ हो जाता है तो अपने दबाव की बात कहेगी और यदि नहीं होता है तो कर्ज माफी का दबाव बनाकर किसानों की सहानुभूति बटोरनी चाहेगी। यही वजह है कि नोटबंदी पर राहुल गांधी के साथ खड़े विपक्ष ने किसानों के मसले पर प्रधानमंत्री से कांग्रेस नेताओं के इस तरह से मिलने पर नाराजगी व्यक्त की। मेरा अपना मानना है कि किसानों के कर्जे माफ कर देने से उनका जीवन स्तर सुधरने वाला नहीं है। किसानों की तरक्की के लिए उनका आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। किसानों को उनकी फलस का उचित मूल्य मिलने के अलावा उन्हें मेहनत भत्ते के रूप में इतना पैसा मिले, जिससे खेती के प्रति उनका लगाव बना रहे। सरकार के इस कदम से जहां किसानों का खेती से हो रहा मोहभंग रुकेगा वहीं उनके बच्चों में भी खेती के प्रति रुझान बढ़ेगा।
जिस तरह से किसानों के परेशानी को लेकर देश में हल्ला हो रहा है उससे तो ऐसा लग रहा है कि जैसे सभी दलों को बस किसानों की ही चिंता है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या ये सत्तारूढ़ अथवा विपक्ष के दल किसानों की समस्याओं को लेकर वास्तव में ही गंभीर हैं ? किसानों के हालात से तो ऐसा नहीं लग रहा है। यदि किसानों की समस्याओं के प्रति गंभीरता बरती जाती तो उनकी इतनी दुर्दशा न हुई होती। जहां तक किसानों के कर्ज माफी योजना की बात है। इस तरह योजनायें देश में कई बार लाई गईं पर क्या हुआ ? सभी योजनाओं का फायदा या तो बैंकों ने उठाया या छोटे व्यापारियों ने या फिर दलालों ने। हां डिफाल्टर किसानों को जरूर फायदा हुआ। ईमानदार किसान तो बस ठगा ही गया। किसानों की समस्याओं पर मंथन करें तो समझ में आता है कि किसानों को कर्जा माफी योजना से ज्यादा जरूरत उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की है।
दरअसल किसान बैंकों या फिर सहकारी समितियों से जो कर्जा लेते हैं, उसे हर साल रिनिअल कर दिया जाता है। कोई भी सरकार जब भी कोई कर्जा माफी योजना लाती है तो वह गत वित्त वर्ष से लागू करती है, जिसमें ईमानदार किसानों का नंबर नहीं आता। हां बैंकों को डूबा हुआ पैसा जरूर मिल जाता है। कहना गलत न होगा कि कर्जा माफी योजना से किसानों को कम और बैंकों को ज्यादा फायदा होता है। जमीनी हकीकत तो यह है कि ये योजनाएं बैंकों के डूबे धन को वापस लाने के लिए ही लाई जाती हैं।
वैसे भी ऋण माफी योजनाओं का इतिहास उठाकर कर देखें तो पता चलता है कि किसान तो मात्र इनसे ठगा ही गया है। चाहे 1989 में वीपी सिंह की अगुआई में बनी जनता दल की सरकार हो या फिर 2004 में कांग्रेस की अगुआई में बनी यूपीए की सरकार। दोनों सरकारें किसान ऋण माफी योजना लाई पर किसानों को इनसे कोई खास फायदा नहीं हुआ। 2008 में लाई गई यूपीए सरकार की किसानों का ऋण माफी योजना को ही देख लीजिए। इस योजना को किसान हित में बताकर कांग्रेस ने खूब ढोल पीटा था। तब यूपीए सरकार ने रालोद प्रमुख अजित सिंह भी शामिल थे वह भी इस योजना को अपने दबाव में लाना बता रहे थे पर कैग ने जब इस योजना का ऑडिट किया तो पता चला कि बैंकों की मिलीभगत से छोटे व्यापारियों ने अपने को किसानों की श्रेणी में दिखाकर अपने कर्जे माफ करा लिए। बाद में इस योजना में बड़ा घोटाला निकला। उस समय बैंक मैनेजरों की मिलीभगत व धोखाधड़ी से किसान बनने वाले व्यापारियों के खिलाफ कार्रवाई तथा इसका फायदा किसानों को दिलाने की बात कही गई थी। उस समय देश में राहुल गांधी की पूरी चल रही थी। तब राहुल गांधी ने कुछ नहीं कराया। अब एनडीए सरकार भी अपने को किसानों का हितैषी बताते-बताते नहीं थक रही है। किसान कर्जा माफी योजना घोटाले पर मोदी सरकार ने भी कुछ नहीं किया। अब जब नोटबंदी पर वोटबैंक की राजनीति चरम पर है तो कांग्रेस किसानों की सहानुभूति बटोरने के लिए प्रधानमंत्री से किसान ऋण माफी योजना बात कर रही है।
इसमें दो राय नहीं कि आज की तारीख में यदि सबसे अधिक कोई परेशान है तो वह किसान है। इसमें भी दो राय नहीं कि समस्याओं से जूझते-जूझते बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं। किसानों को राहत मिलनी भी चाहिए पर क्या वास्तव में राजनीतिक दल किसानों को राहत देना चाहते हैं ? मेरा तो कहना है कि नहीं। यदि ये लोग किसानों की हित की सोचते तो किसानों की यह दुर्दशा न हुई होती।
राहुल गांधी पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के बारे में तो कह रहे हैं कि वह भाजपा में लोकतांत्रिक मूल्य की लड़ाई लड़ रहे हैं पर राहुल गांधी कांग्रेस में क्या कर रहे हैं ? संसद में कई नेता बिना मतलब के शोर मचाते रहते हैं। कांग्रेस के कई बड़े वकील नेता माफियाओं के केस लड़ रहे हैं। उनके खिलाफ राहुल गांधी क्या कर रहे हैं ?
राहुल गांधी को किसानों की इतनी चिंता है तो 2008 की किसान ऋण माफी योजना में हुए घोटाले की जांच के लिए प्रधानमंत्री से क्यों नहीं मिलते ? जिससे योजना के नाम ठगे गए किसानों को राहत मिल सके। नये सिरे से किसान ऋण माफी योजना से क्या किसानों का फायदा होगा ? कुछ खास नहीं, अब भी बैंक, डिफाल्टर किसान और छोटे व्यापारी इसका फायदा उठा ले जाएंगे। ईमानदार किसान तो ठगा जाता रहा है अब फिर से ठगा जाएगा। राहुल गांधी और यू.पी.ए. को यह श्रेय जरूर जाएगा कि उन्होंने अंग्रेजों के 1894  में बनाये भूमि अधिग्रहण कानून को किसानों के हित में सुधार कर नया कानून बनाया और जब नरेन्द्र मोदी सरकार ने आते ही उसके साथ छेड़छाड़ करने की नापाक कोशिश की तो ऐसा जमकर विरोध किया कि उन्हें अपना अध्यादेश वापस लेना पड़ा। 
यह देश का दुर्भाग्य है कि वे लोग किसानों की बात कर रहे हैं, जिन्हें किसानों से कोई लेना-देना नहीं है। देश में गजब का खेल चल रहा है। अमीर गरीब का ठेकेदार बना घूम रहा है। देश में चल रही लूट-खसोट की राजनीति ने किसान पृष्ठभूमि के नेताओं को तो पीछे धकेल दिया है। प्रॉपर्टी डीलिंग, ठेकेदारी और तरह-तरह के धंधे करते-करते राजनेता बने लोग किसानों के बड़े हमदर्द बने घूम रहे हैं। यह बात किसी विशेष दल की नहीं है, लगभग सभी दलों की है।देश में वोटबैंक की राजनीति के अलावा कोई राजनीतिक दल कुछ करने को तैयार नहीं। शीतकालीन सत्र बीत चुका है पर क्या हुआ ? ढाक के तीन पात। यह सत्र बिना किसी काम के पूरा हो गया। लगभग 100 करोड़ रुपए के पानी में बह जाने के नुकसान की भरपाई कौन करेगा? 2008 में यूपीए सरकार द्वारा लाई गई कृषि कर्ज माफी योजना में 25 राज्यों के 92 जिलों से 715 बैंक ब्रांचों में भारी गड़बडि़यां मिली थी। आंध्र के कई गरीब किसान तो किडनी बेचकर सरकारी कर्ज उतारने के लिए मजबूर हो गए थे । कर्ज माफी योजना में घोटाले का मामला संसद में भी उठा था । आज की सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा विपक्ष में मुख्य पार्टी थी। तब इस पार्टी ने भी काफी शोर-शराबा किया था । तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ.  मनमोहन सिंह ने भी जांच कर दोषियों को कड़ी सजा देने की बात कही थी। पर क्या हुआ ? मामला ठंडे बस्ते में पड़ा है। न तो सत्तापक्ष कुछ कर रहा है और न ही विपक्ष।
किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़ें तो यही बताते हैं कि मनरेगा, सहकारी समितियां, कृषि ऋण माफी योजनाएं किसानों के लिए सब बेकार साबित हो रही हैं। किसान के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि देश का किसान हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर है। इसमें दो राय नहीं कि 90 के दशक तक जनता के बीच के लोग जनप्रतिनिधि बनते थे, जो विधानसभा आैर लोकसभा में किसान-मजदूर के हितों की लड़ाई लड़ते थे। कांग्रेस में इंदिरा गांधी के समय तक आम आदमी का ख्याल रखा गया तो भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी के समय तक। समाजवादियों में डॉ. राम मनोहर लोहिया व लोक नायक जयप्रकाश नारायण के बाद मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद व रामविलास पासवान ने कुछ समय तक किसानों के हितों की लड़ाई लड़ी पर आज के हालात में तो जैसे हर पार्टी की राजनीति वोटबैंक तक सिमट कर रह गई है। यह कहना गलत न होगा कि साठ के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के 'जय जवान जय किसान" के नारे को आज की तारीख में झुठलाया जा रहा है।
दरअसल किसानों से हमदर्दी दिखाने का दावा तो हर सरकार करती है पर सच्चाई यह है कि किसानों की  दुखद स्थिति समझने को कोई तैयार ही नहीं। किसानों के हालात को जानने के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि हमारे के लिए अन्न पैदा करने के लिए किसान को किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। देश को चलाने का दावा करने वाले नेताओं को यह समझने की जरूरत है कि जब वे वातानुकूलित कमरों में बैठकर योजनाएं बना रहे होते हैं तो किसान अपने खेतों मे मौसम की मार झेल रहा होता है। गर्मी, सर्दी, बरसात से किस तरह जूझते हुए किसान अन्न उपजाता है। इन सब परिस्थतियों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इसमें दो राय नहीं कि में किसान सबसे अधिक अतिरिक्त मेहनत करता है। किसानों को खेती से जोड़ने के लिए एक मुश्त राशि के रूप में मेहनत भत्ते की व्यवस्था होनी चाहिए। प्रश्न यह उठता है कि यदि सरकारें किसानों के हितों का इतना ही ख्याल रख रही हैं तो किसान खेती से पलायन क्यों कर रहे हैं ? खाद्यान्न के रेट बढ़ रहे हैं तो किसानों की हालत दयनीय क्यों होती जा रही है? किसानों की खुशहाली के लिए बड़े स्तर पर कदम उठाए जा रहे हैं तो किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? 
-स्वामी अग्निवेश

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