इसे अखिलेश यादव की विचारधारा कहें या फिर दृढ़ इच्छाशक्ति कि सरकार के अंतिम दौर में उन्होंने पार्टी में जो स्टैंड लिया वह समाजवाद के लिए मिसाल बन गया। विचारधारा, पार्टी और प्रदेश के लिए वह न केवल व्यवस्था बल्कि अपने चाचा, पिता व पार्टी के मुखिया से भी टकरा गए। अखिलेश करीबियों के टिकट कटने के बाद सपा की राजनीति ने ऐसा करवट लिया कि नेताजी को संगठन से बेदखल कर मार्गदशक की भूमिका में ला दिया गया। वह भी उनके न चाहते हुए विशेष अधिवेशन बुलाकर। हालांकि नेताजी के अपने वजूद के लिए लड़ने को हल्के में नहीं लिया जा सकता है। नेताजी और शिवपाल यादव ने लंबे समय तक संगठन चलाया है और संगठन के काफी नेता इस सरकार में साइडलाइन थे। यदि नेताजी और शिवपाल यादव ने ये नेता संगठित कर चुनाव लड़ लिया तो न केवल अखिलेश खेमे बल्कि समाजवाद को भी भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
यह वही नेताजी हैं, जिन्होंने न केवल अपने गुरु चरण सिंह, बल्कि राज नारायण और चंद्रशेखर से बगावत कर न केवल प्रदेश बल्कि देश में अपना वजूद बनाया। आरक्षण विरोधी आंदोलन तथा राम मंदिर निर्माण आंदोलन के बाद देश में बही हिन्दुत्व की बयार के बाद उन्होंने अपनी अलग समाजवादी पार्टी बनाकर तीन बार प्रदेश की बागडोर संभाली तथा पूर्ण बहुमत के साथ अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया। यह उनका राजनीतिक वजूद ही रहा है कि 1995 में बनी समाजवादियों की सरकार में वह रक्षामंत्री बने। उनका अपना ही एक साथी उनका विरोध न करता तो वह प्रधानमंत्री बन जाते।
जिस तरह से विभिन्न पार्टी कार्यालयों पर अखिलेश खेमे का कब्जा हो रहा है। उससे अखिलेश व शिवपाल गुट में संघर्ष की आशंका बन गई है। आज की तारीख में यह खेल भले ही एकतरफा दिखाई दे रहा हो पर नेताजी के होते इसे एकतरफा समझना भारी भूल होगी। शिवपाल यादव को संगठन मिले कुछ ही दिन ही हुए हैं। अखिलेश यादव की अगुआई में चले संगठन में अधिकतर पदाधिकारी नए नेता थे। नेताजी की बेचैनी का भी कारण पुराने नेताओं की उपेक्षा ही रही है। इस टकराव ने समाजवादी पार्टी को नई और पुरानी पार्टी में बांट दिया है।
यदि नेताजी और अखिलेश यादव अलग-अलग चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ लिए तो मुस्लिम वोटबैंक बसपा की ओर खिसकने का पूरा अंदेशा है। अखिलेश यादव को यह देखना होगा कि मुस्लिम आज भी नेताजी को ही अपना रहनुमा मानते हैं। प्रो. रामगोपाल यादव के सुलह से बिल्कुल इनकार करने से मामला और बिगड़ रहा है। हालांकि आजम खां अभी भी मामला सुलझाने के प्रयास में हैं। मामला बहुत ज्यादा पेचीदा हो गया है। अखिलेश यादव किसी भी कीमत पर अमर सिंह को पार्टी में नहीं देखना चाहते हैं तो नेताजी रामगोपाल यादव को।
इसमें दो राय नहीं कि जिन परिस्थिति में अखिलेश यादव ने विचारधारा और व्यवस्था को लेकर दम भरा है, उससे युवा वोटबैंक उनसे बड़े स्तर पर जुड़ा है। राय इसमें भी दो नहीं कि नेताजी की आज भी अपने वोटबैंक पर पकड़ है। नेताजी का दम-खम अखिलेश यादव भी जानते हैं। यही वजह है कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को साफ निर्देश दे दिया है कि उनके साथ ही नेताजी की फोटो की जरूर लगाई जाए। उनके साथ ही नेताजी जिंदाबाद के भी नारे जरूर लगें। नेताजी के खिलाफ वह एक भी शब्द बर्दाश्त नहीं करेंगे।

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