दिल्ली में दिवाली के बाद छाई खतरनाक धुंध से जब सांस लेने में भी दिक्कतें पैदा होने लगी। दमा और एलर्जी के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई तो लोगों की समझ में आया। बच्चों और महिलाओं ने जंतर-मंतर पर आकर विरोध दर्ज कराया तो तब जाकर केंद्र और राज्य सरकार की नींद खुली। स्थाई समाधान को अनदेखा करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने पिछली सरकारों की तरह ही समय को टालने वाला उपाय ही सोचा। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल दिल्ली में निर्माण कार्य पर रोक तथा जेनरेटर के प्रयोग को प्रतिबंधित करने की बात करने लगे तो उप राज्यपाल नजीब जंग ने कुछ दिनों के लिए बदरपुर प्लांट को बंद कर काम की इतिश्री कर दी। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या इस तरह के प्रयास से इस भीषण समस्या का निदान हो जाएगा ? दिवाली फिर नहीं आएगी ? किसान धान रोपना बंद कर देंगे ? जरूरत समस्या की जड़ में जाने की है। आखिरकार इस तरह की समस्याएं दिल्ली में बार-बार क्यों आती हैं ? दिल्ली ही क्यों यह समस्या तो पूरे देश की होती जा रही है। शहरीकरण के चलते गांवों को उजाड़े जाते समय सरकारों को पैदा होने वाली इस तरह की समस्याओं का आभास नहीं होता ? लंबे समय से गांवों का बोझ लगातार शहरों पर डाला जा रहा है तो सरकारें पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति गंभीर क्यों नहीं हुई। पर्यावरण को बनाए रखने वाले खेत खलिहान खत्म किये जा रहे हैं। शहरों के साथ ही गांवों में जगह-जगह बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण कार्य चलता रहता है। इन निर्माण कार्यों में नियम कानून का पालन न करने की वजह से जो वायु प्रदूषण होता है उस पर सरकारों का ध्यान क्यों नहीं जाता ?
बड़े स्तर पर ऐसे लोग हैं जिन्हें दो कदम चलने के लिए चार पहिया वाहन चाहिए। दिल्ली में रोज लाखों वाहन सड़कों पर चक्कर काटते रहते हैं। बड़े स्तर पर लोग अपने घरों की गंदगी सड़कों पर फैला दे रहे हैं। रहने व काम करने की हर जगह वातानुकूलित चाहते हैं। दिल्ली में ही 80 लाख रिहायशी बस्तियां हैं। ऐसे में दिल्ली का वातावरण कैसे सुधरेगा ?
समझने की जरूरत यह है कि दिल्ली के पर्यावरण को बचाने में आसपास के क्षेत्र में होने वाली खेती-बाड़ी का बहुत योगदान रहा है। सरकारें हैं कि इस जमीन को कंक्रीट और ईंटों से बनी इमारतों से ढक दे रही हैं। जिस किसान की वजह से पर्यावरण दूषित होने से बचता है उसी को दिल्ली में होने वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। पराली कोई पहली बार नहीं जलाई गई है। सरकार की नीति देखिये कि जहां सरकारों को पर्यावरण को बचाने के लिए खेतीबाड़ी को बढ़ावा देना चाहिए वहीं नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढि़या आयोग की वेबसाइट पर ब्लाग लिखकर किसानों को खेती छोड़कर अन्य धंधे में लगने के लिए उकसा रहे हैं। उनके अनुसार किसान खेती की अपेक्षा आैद्योगिक क्षेत्र को अपनाकर ज्यादा समृद्ध हो सकते हैं। इनका मतलब है कि किसान भी अपनी जमीन पर बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर व्यापार करें। सरकार को देखना होगा कि हर वर्ष करीब 50 हजार हेक्टेयर खेती योग्य भूमि कंक्रीट युक्त हो रही है। यह देश की व्यवस्था है कि जब दिल्ली में बैठे लोगों की जान पर बन आती है तो इन्हें चिंता होती है। दिल्ली की धुंध पर तो देश का पूरा मीडिया जगत जुट गया पर जब दूर-दराज गांवों में रह रहे गरीब लोग विभिन्न कारणों से प्रभावित होते हैं तो किसी का कोई ध्यान नहीं जाता। इसी वर्ष लगभग 2000 किसानों ने ख़ुदकुशी की और 26 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हो गए। इस पर किसी तंत्र ने क्यों ध्यान नहीं दिया या फिर क्यों नहीं चिंता जाहिर की।
सरकारों का हाल यह है कि व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए मुठ्ठीभर पूंजीपतियों के लिए सौ करोड़ से अधिक लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। अंधाधुन्ध हो रहे शहरीकरण ने शुद्ध हवा और पानी भी छीन लिया है। इस दशक में लाखों हेक्टेयर हरी-भरी खेती की जमीन शहरी भवन और सड़क निर्माण के लिए हड़प ली गई। सैकड़ों नदियों-को संकरा कर दिया गया। हजारों तालाबों को पाट दिया गया। गांवों में रोजगार न होने की वजह से गत पांच वर्ष में गांवों से लगभग दो करोड़ से अधिक लोग शहरों में आने के लिए मजबूर हुए हैं। इन सबके लिए कौन जिम्मेदार है ? इस पर मंथन की जरूरत है।
गांवों में जो कचरा खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में इस्तेमाल होता है वही कचरा दिल्ली में वायु प्रदूषण को बढ़ा रहा है। जो कचरा राजस्व बढ़ा सकता है, उसको ठिकाने लगाने के लिए जनता के खून पसीने की कमाई की बर्बादी हो रही है। इसे सरकारों की निर्जल्लजता ही कहा जाएगा की समय-समय पर पर्यावरण को लेकर मचने वाले शोर से इन सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ता। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी की फटकार का भी। अब जब बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों की जिंदगी पर बना आई तो देश में हो-हल्ला मच गया।
वोटबैंक के लिए झुग्गी-झोंपड़ियों में रह रहे लोगों का जीवन स्तर नहीं सुधारा जाता है। यदि इन लोगों के के लिए मकानों की व्यवस्था हो जाए तो इससे भी वायु प्रदूषण में सुधार होगा। अमीरों के एक-एक घर में कई -कई गाड़ियां हैं। क्या इनसे वायु प्रदूषण नहीं होता है ? बरसात खत्म होते ही हर वर्ष दिल्ली में एक नई बीमारी आ जाती है। कभी डेंगू तो कभी बर्ड फ्लू, कभी स्वाइन फ्लू और कभी चिकन गुनिया। कोई भी समस्या हो उसके निदान पर कम और उसकी आड़ में पैसा कमाने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। तो कैसे दूर होगी दिल्ली की वायु प्रदूषण की यह समस्या ?
दरअसल आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं। गावों, खेत-खलिहान, पर्वत, नदियों, तालाबों का अपने में समेटे देश की बुनियाद को खोखला करने में लगे हैं। भागम-भाग की इस जिंदगी में ऐसा लगा रहा है कि जैसे लोगों को हवा, पानी और खाना नहीं बस पैसा चाहिए। पैसे के लिए हो रही यह मारामारी ही हमारी जान पर बनकर आ खड़ी हो गई है। यदि हम वास्तव में शुद्ध हवा और पानी चाहते हैं तो हमें गांवों का विकास कर शहरों का बोझ कम करना होगा। यह बड़ी-बड़ी इमारतों वाला विकास नहीं बल्कि प्रकृति से सराबोर विकास हो । स्थिति यह है कि ज्यों-ज्यों लोगों पर पैसा बढ़ रहा हैं त्यों-त्यों इस पैसे का दुरूपयोग प्रकृति के तहस-नहस करने में किया जा रहा है।
तीज-त्यौहार और हर समारोह में यहां तक कि किसी देश में क्रिकेट मैच की भारत जीत हो आतिशबाजी करना आम बात हो गया है। यह कोई समझने के लिए तैयार नहीं कि इस आतिशबाजी का लोगों के स्वास्थ्य पर कितना प्रतिकूल असर पड़ रहा है। प्रकृति से हमें कुछ चाहिए तो उसका भी ध्यान रखना होगा। हवा को शुद्ध करने वाले पर्वतों को काट-काट कर होटल बना दिए गए हैं। कहां से आएगी शुद्ध हवा ? व्यवस्था का यह हाल है कि समस्या आती है कुछ दिन बातें होती हैं और लोग भूल जाते हैं। दिल्ली की खतरनाक हुई हवा की बात ही ले लीजिये। थोड़ी सी ही राहत से राज्य और केंद्र सरकार दोनों शांत पड़ती प्रतीत हो रही हैं। हालांकि सुप्रिम कोर्ट ने इस धुंध पर राज्य और केंद्र सरकारों से जवाब मांगा है और सरकारें जवाब दे भी देंगी पर क्या होगा, ढाक-के तीन पात। जब तक इस तरह की समस्याओं का स्थाई समाधान नहीं होगा तब तक हमें इसी तरह से परेशान होता रहना पड़ेगा। यह वायु प्रदूषण कितना घातक होता जा रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इससे पुरुषों के नपुंसकता तथा महिलाओं में बांझपन होने की आशंका बढ़ती जा रही है। इसके बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि इससे हवा में खकरनाक भारी धातुओं की मात्रा बहुत बढ़ती जा रही है। धूल के कणों में मौजूद पोलिसाइक्लिक, हाइड्रोकार्बन, शीशा और पारा सीधे शरीर में हार्मोन को प्रभावित कर रहे हैं। कुल मिलाकर इन समस्याओं से टुकड़ों में समाधान न ढूंढकर विकास की अवधारणा पर गम्भीर मंथन होना चाहिए। गौतम बुद्ध की विचारधारा से महात्मा गांधी की समालोचना से प्रभावित होकर साठ के दशक में ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ. शुभाकर ने जो क्रांतिकारी पुस्तक लिखी थी-स्माल इस ब्यूटीफुल उसको और उसी तरह एल्विन टाफ्लर की रचनाओं से सबक लेकर एक पूरी व्यवस्थागत परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाने का समय आ गया है। विकास के नाम पर विनाश की जहरीली अवधारणा आखिर कब तक?
बड़े स्तर पर ऐसे लोग हैं जिन्हें दो कदम चलने के लिए चार पहिया वाहन चाहिए। दिल्ली में रोज लाखों वाहन सड़कों पर चक्कर काटते रहते हैं। बड़े स्तर पर लोग अपने घरों की गंदगी सड़कों पर फैला दे रहे हैं। रहने व काम करने की हर जगह वातानुकूलित चाहते हैं। दिल्ली में ही 80 लाख रिहायशी बस्तियां हैं। ऐसे में दिल्ली का वातावरण कैसे सुधरेगा ?
समझने की जरूरत यह है कि दिल्ली के पर्यावरण को बचाने में आसपास के क्षेत्र में होने वाली खेती-बाड़ी का बहुत योगदान रहा है। सरकारें हैं कि इस जमीन को कंक्रीट और ईंटों से बनी इमारतों से ढक दे रही हैं। जिस किसान की वजह से पर्यावरण दूषित होने से बचता है उसी को दिल्ली में होने वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। पराली कोई पहली बार नहीं जलाई गई है। सरकार की नीति देखिये कि जहां सरकारों को पर्यावरण को बचाने के लिए खेतीबाड़ी को बढ़ावा देना चाहिए वहीं नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढि़या आयोग की वेबसाइट पर ब्लाग लिखकर किसानों को खेती छोड़कर अन्य धंधे में लगने के लिए उकसा रहे हैं। उनके अनुसार किसान खेती की अपेक्षा आैद्योगिक क्षेत्र को अपनाकर ज्यादा समृद्ध हो सकते हैं। इनका मतलब है कि किसान भी अपनी जमीन पर बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर व्यापार करें। सरकार को देखना होगा कि हर वर्ष करीब 50 हजार हेक्टेयर खेती योग्य भूमि कंक्रीट युक्त हो रही है। यह देश की व्यवस्था है कि जब दिल्ली में बैठे लोगों की जान पर बन आती है तो इन्हें चिंता होती है। दिल्ली की धुंध पर तो देश का पूरा मीडिया जगत जुट गया पर जब दूर-दराज गांवों में रह रहे गरीब लोग विभिन्न कारणों से प्रभावित होते हैं तो किसी का कोई ध्यान नहीं जाता। इसी वर्ष लगभग 2000 किसानों ने ख़ुदकुशी की और 26 हजार से ज्यादा बच्चे लापता हो गए। इस पर किसी तंत्र ने क्यों ध्यान नहीं दिया या फिर क्यों नहीं चिंता जाहिर की।
सरकारों का हाल यह है कि व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए मुठ्ठीभर पूंजीपतियों के लिए सौ करोड़ से अधिक लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है। अंधाधुन्ध हो रहे शहरीकरण ने शुद्ध हवा और पानी भी छीन लिया है। इस दशक में लाखों हेक्टेयर हरी-भरी खेती की जमीन शहरी भवन और सड़क निर्माण के लिए हड़प ली गई। सैकड़ों नदियों-को संकरा कर दिया गया। हजारों तालाबों को पाट दिया गया। गांवों में रोजगार न होने की वजह से गत पांच वर्ष में गांवों से लगभग दो करोड़ से अधिक लोग शहरों में आने के लिए मजबूर हुए हैं। इन सबके लिए कौन जिम्मेदार है ? इस पर मंथन की जरूरत है।
गांवों में जो कचरा खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में इस्तेमाल होता है वही कचरा दिल्ली में वायु प्रदूषण को बढ़ा रहा है। जो कचरा राजस्व बढ़ा सकता है, उसको ठिकाने लगाने के लिए जनता के खून पसीने की कमाई की बर्बादी हो रही है। इसे सरकारों की निर्जल्लजता ही कहा जाएगा की समय-समय पर पर्यावरण को लेकर मचने वाले शोर से इन सरकारों पर कोई असर नहीं पड़ता। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी की फटकार का भी। अब जब बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों की जिंदगी पर बना आई तो देश में हो-हल्ला मच गया।
वोटबैंक के लिए झुग्गी-झोंपड़ियों में रह रहे लोगों का जीवन स्तर नहीं सुधारा जाता है। यदि इन लोगों के के लिए मकानों की व्यवस्था हो जाए तो इससे भी वायु प्रदूषण में सुधार होगा। अमीरों के एक-एक घर में कई -कई गाड़ियां हैं। क्या इनसे वायु प्रदूषण नहीं होता है ? बरसात खत्म होते ही हर वर्ष दिल्ली में एक नई बीमारी आ जाती है। कभी डेंगू तो कभी बर्ड फ्लू, कभी स्वाइन फ्लू और कभी चिकन गुनिया। कोई भी समस्या हो उसके निदान पर कम और उसकी आड़ में पैसा कमाने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। तो कैसे दूर होगी दिल्ली की वायु प्रदूषण की यह समस्या ?
दरअसल आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं। गावों, खेत-खलिहान, पर्वत, नदियों, तालाबों का अपने में समेटे देश की बुनियाद को खोखला करने में लगे हैं। भागम-भाग की इस जिंदगी में ऐसा लगा रहा है कि जैसे लोगों को हवा, पानी और खाना नहीं बस पैसा चाहिए। पैसे के लिए हो रही यह मारामारी ही हमारी जान पर बनकर आ खड़ी हो गई है। यदि हम वास्तव में शुद्ध हवा और पानी चाहते हैं तो हमें गांवों का विकास कर शहरों का बोझ कम करना होगा। यह बड़ी-बड़ी इमारतों वाला विकास नहीं बल्कि प्रकृति से सराबोर विकास हो । स्थिति यह है कि ज्यों-ज्यों लोगों पर पैसा बढ़ रहा हैं त्यों-त्यों इस पैसे का दुरूपयोग प्रकृति के तहस-नहस करने में किया जा रहा है।
तीज-त्यौहार और हर समारोह में यहां तक कि किसी देश में क्रिकेट मैच की भारत जीत हो आतिशबाजी करना आम बात हो गया है। यह कोई समझने के लिए तैयार नहीं कि इस आतिशबाजी का लोगों के स्वास्थ्य पर कितना प्रतिकूल असर पड़ रहा है। प्रकृति से हमें कुछ चाहिए तो उसका भी ध्यान रखना होगा। हवा को शुद्ध करने वाले पर्वतों को काट-काट कर होटल बना दिए गए हैं। कहां से आएगी शुद्ध हवा ? व्यवस्था का यह हाल है कि समस्या आती है कुछ दिन बातें होती हैं और लोग भूल जाते हैं। दिल्ली की खतरनाक हुई हवा की बात ही ले लीजिये। थोड़ी सी ही राहत से राज्य और केंद्र सरकार दोनों शांत पड़ती प्रतीत हो रही हैं। हालांकि सुप्रिम कोर्ट ने इस धुंध पर राज्य और केंद्र सरकारों से जवाब मांगा है और सरकारें जवाब दे भी देंगी पर क्या होगा, ढाक-के तीन पात। जब तक इस तरह की समस्याओं का स्थाई समाधान नहीं होगा तब तक हमें इसी तरह से परेशान होता रहना पड़ेगा। यह वायु प्रदूषण कितना घातक होता जा रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इससे पुरुषों के नपुंसकता तथा महिलाओं में बांझपन होने की आशंका बढ़ती जा रही है। इसके बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि इससे हवा में खकरनाक भारी धातुओं की मात्रा बहुत बढ़ती जा रही है। धूल के कणों में मौजूद पोलिसाइक्लिक, हाइड्रोकार्बन, शीशा और पारा सीधे शरीर में हार्मोन को प्रभावित कर रहे हैं। कुल मिलाकर इन समस्याओं से टुकड़ों में समाधान न ढूंढकर विकास की अवधारणा पर गम्भीर मंथन होना चाहिए। गौतम बुद्ध की विचारधारा से महात्मा गांधी की समालोचना से प्रभावित होकर साठ के दशक में ब्रिटिश अर्थशास्त्री ई.एफ. शुभाकर ने जो क्रांतिकारी पुस्तक लिखी थी-स्माल इस ब्यूटीफुल उसको और उसी तरह एल्विन टाफ्लर की रचनाओं से सबक लेकर एक पूरी व्यवस्थागत परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ाने का समय आ गया है। विकास के नाम पर विनाश की जहरीली अवधारणा आखिर कब तक?

bilkul, nahi to delhi men rahna mushkil ho jayega
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