मंगलवार, 22 नवंबर 2016

हादसों की पटरी पर बुलेट रेल का सपना

कानपुर के पोखरायां में शनिवार की भोर में इंदौर से राजेंद्रनगर यानी पटना जा रही इंदौर एक्सप्रेस डी-रेल हो गई। इस हादसे में अभी तक 130 से अधिक लोगों की जहां मौत हो गई वहीं 200 से अधिक लोग जख्मी हुए जिनका इलाज विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है। लेकिन मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती हैं क्योंकि अभी भी लोग क्षतिग्रस्त कोचों में फंसे हुए है। हलांकि बचाव एंव राहत दल के दावों को माने तो उनके जिंदा बच निकलने की कोई उम्म्मीद नहीं दिखती है। देश में पहली रेल दुर्घटना जनवरी 1869 में पूना-मुंबई रेल लाइन पर हुई थी। जिसकी वजह से तत्कालीन रेलमंत्री लालबहादुर शास्त्री को नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र दे पड़ा था। इसके बाद यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। कानपुर हादसा भारतीय रेल सुरक्षा और संरक्षा दावों की पोल खोलता है।
आम तौर पर लोगों में रेल की सवारी को सबसे सुरक्षित और संरक्षित माना जाता है लेकिन बढ़ती बदइंतजामी और हादसों की वजह से रेलयात्रा सुखद और आरामदायक के बजाय मौत का सफर बनता जा रहा है। एक तरफ हम देश में बुलेट रेल चलाने का सपना देख रहे हैं जबकि दूसरी तरफ लोग बेमौत मर रहे हैं। अभी तक रेल सफर को हम सुरक्षित नहीं बना पाएं हैं। हमारे लिए यह सबसे बड़ी चुनौती है। जब तक हम सामान्य रेल सफर को संरक्षित और सुरक्षित बनाने में नहीं कामयाब होंगे तब तक बुलेट रेल का सपना हमारे लिए एक दिवा स्वप्न से अधिक कुछ नहीं होगा। रेल यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा और उनके हितों की चिंता पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी हाल की अपनी जापान यात्रा में पीएम शिजें आबे के साथ बुलेट रेल में बैठ उसकी तकनीकी तकनीकी जानकारियांे और निर्माण स्थल का भी जायजा लिया।
यह अच्छी बात है लेकिन इसका फायदा तभी होगा जब हम देश में मौजूद रेल प्रणाली को और बेहतर और सुरक्षित बनाने में कामयाब होंगे। पोखरायां रेल हादसा हमारे लिए बड़ी चुनौती है। इंदौर से लेकर वाराणसी, लखनउ और पटना, उज्जैन और दूसरे  स्थानों के लोग हादसे का शिकार हुए हैं। यूपी, एमपी और बिहार के लोगों की जान गयी है। शहनाई की खुशियां मातम में तब्दील हो गई हैं। पूरा का पूरा परिवार हादसे की बलि चढ़ गया है। पीड़ित परिजन अपनों की खोज मंे भटक रहे हैं। कुछ मिल गए हैं लेकिन अभी अधिकांश लोगों का पता नहीं है। यह सबसे दुःखद घटना है। जिस समय यह हादसा हुआ वह भोर का समय रहा लोग गहरी नींद में सो रहे थे। उन्हें पता तक नहीं था कि हम अगली सुबह का सूरज नहीं देख पाएंगे। बेपटरी हुइ रेल के साथ लोगों की जिंदगी और सपने भी बेपटरी हो गए। सगुन और शादियों की खुशियां मौत के आगोश में समा गयी।
रेल हादसा क्यों हुआ यह जांच का विषय है। लेकिन इस हादसे से बड़ा सवाल उठाता है कि भारतीय रेल के आधुनिकी करण की सारी कोशिश क्यों फेल हुई है। सरकारें इस पर सिर्फ सियासी आंसू बहा और मुवावजे की रकम अदा कर अपनी पीठ थपथपाती हैं। लेकिन जमींनी हकीकत यही है कि हमारी रेल के पास सुविधाओं का अभाव है। भारी संख्या में संरक्षा और सुरक्षा कर्मचारियों की कमी है। ढेड लाख से अधिक सुरक्षा कर्मचारियों के पाद खाली पड़े हैं। देश में मानव रहित समपारों सें रेल गाड़िया गुजरती हैं जिससे आए दिन हादसों की खबरें मिलती हैं। सरकारों ने रेल को कमायी और आर्थिक दोहन का जरिया बनाया। खूब किराए बढ़ाए गए। टिकटों की आड़ में अनाब सनाब पेनाल्टी और आय बढ़ाने को नियम बनाए गए। लेकिन खान-पान और सुविधाओं के साथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए कोई  तरक्की नहीं हुइ। भारत दुनिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है लेकिन यह हादसों के लिए भी जाना जाता है। आंकड़ों के मुताबिक हर साल देश में तकरीबन 300 रेल दुर्घटनाएं होती हैं। रेल पटरियों में हर दिन 15,000 रेल गाड़ियां दौड़ लगाती है। तकरीबन 65 हजार किलोमीटर रेलमार्ग पर 55 हजार रेल कोच और ढाई लाख बैगन संचालित होते हैं।
रेल विभाग दावा करता है कि अधिकांश हादसे चालक की लापरवाही से होते है जिसका फीसद तकरीबन 75 फीसद होता है। कानपुर रेल हादसे में भी अचानक ब्रेक लगने की बात सामने आ रही है लेकिन यह जांच के बात साबित होगा।  2011-12 में कुल 115 हादसों में 85 फीसदी से अधिक दर्घटनाएं मानवीय चूक से हुई। मानव रहित समपार पर तकरीबन 1500 से अधिक लोगों की मौत प्रति वर्ष होती है। देश में 30 हजार रेलवे क्रासिंग में 11 हजार मानव रहित हैं। हलांकि रेल ने सभी मानव रहित समपारों को समाप्त कर ओवरब्रिज बानाने और सिस्टम में लाने का एलान किया है लेकिन अभी इसमें वक्त लगेगा। रेल सुधार के लिए 2012 में सैम पित्रोदा समिति ने 5 खरब से अधिक रुपयों की जरुरत बतायी थी। जबकि अनिल काकोदर समिति ने केवल रेल सुरक्षा पर ही एक अरब से अधिक धनराशि की आवश्यकता बतायी। देश में तकरीनब 350 अरब की परियोजनाएं लंबित पड़ी हैं।
इसके अलावा रेलवे में बढ़ते भ्रष्टाचार और ठेका प्रथा को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। क्योंकि औपनिवेशिक काल में रेलवे में जो भी निर्माण हुए आज आधुनिक तकनीक और व्यवस्था के बाद भी इतने ठोस और टिकाउ काम नहीं हो रहे हैं। रेलवे निर्माण में घटिया सामाग्री का जहां इस्तेमाल किया जा जाता है वहीं कमीशनखोरी से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। बुलेट रेल का सपना देखने वाले देश में आज भी कई इस तरह के रेल क्षेत्र हैं जहां टेनों को बगैर सिंगनल के चलाया जाता है। मीडिया में जो खबरंे आ रही हैं उसके मुताबिक रेल लाइन में फैक्चर की बात हो सकती है। रेल हादसे के कारणों में यह अहम हो सकता है। क्योंकि हादसे में मीडिल बोगियां पलटी हैं आम तौर पर यह टैक में फैक्चर की वजह से होता है।
लेकिन जब मुख्य रेल लाइनों की अल्टासोनिक वाल डिटेक्शन एक निश्चित समय पर होती है फिर यह हादसा कैसे हुआ। ठंड की वजह से पटरियां सिकुड़ती हैं लेकिन अभी उस तरह का मौसम नहीं है। जिस जगह रेल हादसा हुआ है। संभतः वहां कोई ज्वाइंट सेक्शन भी नहीं दिखता है। दूसरी वजह यह भी बतायी जा रही है जिस जगह हादसा हुआ था वहां रेल टैक के नीचे गड्ढे होने की बात आ रही है। रेल चालकों को कई बार गाड़ियों के गुजरने के बाद यह महसूस हो रहा था लेकिन किसी ने शिकायत करने की जहमत नहीं उठायी। जबकि इंदौर-पटना एक्सप्रेस के चालक की तरफ से कुछ इसी तरह की रिपोर्ट सौंपने की बात आ रही है।
जिामें लर्च यानी पटरियों की नीचे गड्ढे की बात बतायी गयी है। दूसरी बात यह भी सामने आ रही है कि हादसे के वक्त टेन की गति काफी तेज थी। जबकि इसके पहले जो गाड़ी गुजरी थी वह सामान्य गति में रही। अधिक गति होने से टैक में फैक्चर अधिक चौड़ा हो गया होगा और टेन बेटरी हो गयी। इसके अलावा देश में बढ़ती व्यापारिक गतिविधियां भी इस हादसे का जिम्मेदार हो सकती हैं क्योंकि बैगनों में ओवर लोडिंग से भी पटरियों पर अधिक भार बढ़ने से फैक्चर की स्थितियां बढ़ सकती है।। हादसे की निष्पक्ष जाच होनी चाहिए। दोषियों को सजा मिलनी चाहिए। हादसे रोकने के लिए तकनीकी उपायों का सहारा ढूढ़ना होगा जिससे रेल सफर सुरक्षित हो संरक्षित हो पाए। हम इसके लिए किसी एक सरकार को दोषी नहीं बना सकते। इसकी जिम्मेदारी पूर्व सरकारों की भी बनती है। लेकिन सभी सरकारों का नजरिया रेलवे से आर्थिक दोहन का अधिक तनक्की का कम रहा है। अगर सुरक्षा और दूसरे हालात यही रहे तो बुलेट रेल परियोजना धरातल में लाना एक कल्पना भर होगी। का सपना पर सवाल उठना लाजमी हैं।
लेखक प्रभुनाथ शुक्ल स्वतंत्र पत्रकार हैं
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