समग्र इस्लामी जगत हालांकि किसी मुस्लिम पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को तीन बार तलाक तलाक तलाक कहने पर तलाक हो जाने के किसी कथित इस्लामी दिशा निर्देश को नहीं मानता इसके बावजूद इन दिनों हमारे देश में यह विषय मीडिया के माध्यम से इतना प्रचारित किया जा रहा है गोया यह पूरे मुसलमानों से जुड़ा कोई ज्वलंत मुद्दा हो। मज़े की बात तो यह है कि इस मुद्दे का राजनैतिक लाभ उठाने की $िफराक़ में लगे जो लोग मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने का ढोंग कर रहे हैं तथा स्वयं को महिलाओं के हित चिंतक के रूप में पेश कर रहे हैं यह वही लोग हैं जो भारतीय मुसलमानों को दी जाने वाली किसी भी प्रकार की सुविधा का यह कहकर विरोध किया करते थे कि यह 'तुष्टिकरणÓ के लिए किया जा रहा है तथा यह बहुसंख्यकों के अधिकारों का हनन है। यशोदा बेन, इशरत जहां तथा कौसर बी को न्याय से वंचित रखने वाले लोग जब महिलाओं के हित चिंतक होने का ढोंग करने लग जाएं तो इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है?
पूरे विश्व में तो तीन बार तला$क बोलने पर तलाक होने जैसी मान्यता कहीं है ही नहीं यहां तक कि हमारे देश में जहां आज यह मुद्दा महज़ राजनैतिक स्वार्थ के लिए खासतौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे का लाभ उठाने की गरज़ से उठाया जा रहा है, यहां भी देश के मुसलमान इस व्यवस्था अथवा तरीके को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करते। मुस्लिम समाज का संभवत: दस प्रतिशत वर्ग भी ऐसा नहीं होगा जो तीन तलाक की व्यवस्था को स्वीकार करता हो अथवा इसपर अमल करता हो। इस मुद्दे पर शोर-शराबा करने और इसकी आड़ में स्वयं को मुस्लिम महिलाओं का शुभचिंतक साबित करने की कोशिश करना महज़ एक ड्रामा तथा पाखंड के सिवा और कुछ नहीं। इस विषय को प्रचारित करना वैसा ही है जैसाकि मुसलमानों द्वारा चार शादियां किया जाना और 40 बच्चे पैदा किया जाना। कुछ बुद्धिमान टीवी एंकर पूरे आत्मविश्वास के साथ अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में भारत में कोई ऐसा मुसलमान नहीं देखा जिसने चार शादियां की हों और उसके 40 बच्चे हों। परंतु इस्लाम धर्म तथा मुसलमानों को बदनाम करने वालों द्वारा इस दुष्प्रचार की आड़ में बहुसंख्य समुदाय में भय फैलाकर वोटों के ध्रुवीकरण का काम बखूबी अंजाम दिया जाता रहा है। तीन तला$क का मुद्दा मुस्लिम समुदाय के अति सीमित वर्ग द्वारा अपनाया जाने वाला उनका आपसी व व्यक्तिगत् मुद्दा है। मुस्लिम उलेमा इस दुवर््यवस्था से निपटने के लिए स्वयं समय-समय पर वार्ताएं करते रहते हैं। वैसे भी इस भोंडेपन के साथ तलाक दिए जाने का जि़क्र कुरान शरीफ से लेकर किसी इस्लामी शरीयत या किसी हदीस में नहीं है। कुछ पुरानी $िफल्मों में तला$क-तला$क-तलाक कहकर तलाक दिए जाने की व्यवस्था को इस्लाम धर्म में स्वीकार्य तला$क व्यवस्था के रूप में प्रचारित ज़रूर कर दिया है।
हालांकि मुस्लिम धर्म के जिस किसी सीमित वर्ग में इस प्रकार से तलाक दिए जाने का चलन है निश्चित रूप से वह एक सामाजिक बुराई है तथा इस प्रकार तलाक दिए जाने से उन मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन भी होता है जो इससे प्रभावित होती हैं। परंतु इस विषय को उछाल कर स्वयं को महिलाओं का मसीहा बना कर पेश करना या इसकी आड़ में समान नागरिक संहिता का रास्ता तय करने जैसे अपने राजनैतिक एजेंडे पर चलने की कोशिश करना $कतई मुनासिब नहीं है। यदि इसे सामाजिक बुराई के रूप में देखा जाए तो ऐसी सैकड़ों सामाजिक बुराईयां अन्य धर्मों में भी पाई जाती हैं। मिसाल के तौर पर अक्सर यह खबरें सुनने को मिलती हैं कि जाति विशेष के लोगों का मंदिरों में प्रवेश वर्जित है। लिंग विशेष के लोग अमुक मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकते। जाति विशेष के लोग अमुक कुंए से पानी नहीं ले सकते। जाति विशेष के लोग अपनी शादी में घोड़ी पर बैठने का अधिकार नहीं रखते। यहां तक कि कई जगह उन्हें चारपाई कुर्सी अथवा किसी भी ऊंची जगह पर बैठने नहीं दिया जाता। और यदि यह लोग सहस्त्राब्दियों से चली आ रही इन त्रासदीपूर्ण दुवर््यवस्थाओं का विरोध करते हैं या इसकी अनदेखी करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें अपमानित होना पड़ता है और कई जगह हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। आज देश की सबसे पहली ज़रूरत यह है कि इस सामाजिक भेदभाव को मिटाया जाए। आज हमारे देश में $गरीब व असहाय महिलाओं को दबंगों द्वारा कभी उसकी संपत्ति पर $कब्ज़ा करने के लिए तो कभी उससे जातिगत रंजिश की वजह से उसे चुड़ैल बताकर पीटा जाता है,उसे निर्वस्त्र कर उसी के गांव मोहल्ले में घुमाया जाता है, उसके बाल मूंड दिए जाते हैं तथा मुंह काला कर दिया जाता है। यहां तक कि उसकी हत्या तक कर दी जाती है। आज तक किसी राजनेता द्वारा इस विषय के विरुद्ध किसी प्रकार का आंदोलन चलाने या इस व्यवस्था का सार्वजनिक विरोध किए जाने की $खबर नहीं सुनाई दी। क्या यह विषय तीन तला$क पर पाखंड किए जाने से ज़्यादा ज़रूरी व समाज के लिए हितकारी विषय नहीं है?
आज जो लेाग मुस्लिम महिलाओं के शुभचिंतक बनकर तीन तला$क के मुद्दे को देश का सबसे ज्वलंतशील मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें सांप्रदायिक दंगों के समय मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर भी नज़र डालने की ज़रूरत है। देश में जब भी सांप्रदायिकता की आंधी चलती है और महिलाओं के यही ढोंगी शुभचिंतक इस काली आंधी को हवा देते हैं उस दौरान इस त्रासदी का सबसे बड़ा शिकार महिलाओं को ही होना पड़ता है। यहां अब यह दोहराने की आवश्यकता नहीं कि 1984 के सिख विरोधी दंगों तथा 2002 के गुजरात के दंगों में महिलाओं पर आ$िखर कौन सा ज़ुल्म नहीं ढाया गया। गर्भवती महिलाओं के साथ बलात्कार से लेकर उनका पेट फाडऩे तक क्या कुछ नहीं किया गया? हद तो यह है कि अभी पिछले दिनों मेवात क्षेत्र में एक मुस्लिम परिवार के साथ घटी सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री इस घटना को छोटी-मोटी घटना बताते सुने गए। ऐसी घटनाओं के समय महिलाओं के हित चिंतक आ$िखर कहां मुंह छिपाकर बैठे रहते हैं। अभी कुछ समय पूर्व जब शनि शिंगणापुर के मंदिर में प्रवेश करने हेतु तृप्ति देसाई द्वारा आंदोलन चलाया गया था तो जो आज स्वयं को महिलाओं का हितैषी बताकर उनके अधिकारों की लड़ाई लडऩे की बात कह रहा है इसी वर्ग के लोग देसाई का यह कहकर विरोध कर रहे थे कि वह धर्मविरोधी है और हमारे प्राचीन धार्मिक परंपराओं का निरादर कर रही है। और जब कुछ नहीं बन पड़ा तो उसे यह कहने लगे कि वह कांग्रेस की एजेंट है। देसाई पर अंतिम प्रहार यह कहकर किया गया कि शनि मंदिर में महिलाओं के जाने की जि़द करने वाली यह महिला, महिलाओं के लिए प्रतिबंधित दरगाहों में महिलाओं के प्रवेश के लिए आंदोलन क्यों नहीं चलाती? जबकि देसाई ने बाद में हाजी अली में महिलाओं के प्रवेश को लेकर आंदोलन भी चलाया और पिछले दिनों अदालत ने हाजी अली की दरगाह में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाज़त भी दे दी।
बड़े अफसोस की बात है कि जब चुनाव सिर पर मंडराने लगते हैं उसी समय शातिर राजनेता जो जनता के बीच अपने किए गए वादों को लेकर उन्हें मुंह दिखाने लायक नहीं रहते वे इसी प्रकार के भावनात्मक मुद्दे तलाश करते हैं। कभी मंदिर, कभी मस्जिद, कभी धर्म-जाति, कभी आरक्षण का लॉली पॉप कभी गाय तो कभी गंगा, कभी धर्म विशेष की बढ़ती जनसंख्या का भय तो कभी सेना की कारगुज़ारियों का श्रेय लेने की कोशिश गोया इनमें से कोई भी मुद्दा ऐसा नहीं होता जो सीधेतौर पर आम जनता के रोटी-कपड़ा और मकान से जुड़ा मुद्दा हो। तीन तला$क का मुद्दा भी एक ऐसा ही भावनात्मक मुद्दा है जो उत्तर प्रदेश में चुनावी वातावरण में जानबूझ कर उछाला गया है। अब यह आम मतदाताओं को समझना है कि वह राजनेताओं के इस प्रकार के किसी भी झांसे में आने के बजाए उनसे सीधेतौर पर उनके द्वारा पिछले चुनाव में किए गए वादों को याद दिलाए। और उनसे पूछे कि आ$िखर देश में मंहगाई कम क्यों नहीं हुई? बेरोज़गारी दूर क्यों नहीं हो रही है? विदेशों में जमा काला धन वापस क्यों नहीं आ पा रहा है? हमारे खातों में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये क्यों नहीं जमा हो रहे हैं? सबका साथ सबका विकास का नारा देकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार सबके विकास की चिंता करने के बजाए केवल कारपोरेट जगत के लोगों के विकास की ही चिंता में क्यों लगी हुई है? गत् दो वर्षों में देश में किसानों द्वारा रिकॉर्ड स्तर पर आत्महत्याएं क्यों की गईं? क्या वजह है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में विजय माल्या जैसा अरबों रुपये गबन करने वाले व्यक्ति को तो फरार होने का मौका दे दिया जाता है जबकि एक साधारण गरीब या किसान कजऱ्दार जेल में ठूंस दिया जाता है? यह हैं तीन तला$क से कहीं अधिक ज्वलंतशील मुद्दे जिनपर राजनेताओं को विचार करना चाहिए।
पूरे विश्व में तो तीन बार तला$क बोलने पर तलाक होने जैसी मान्यता कहीं है ही नहीं यहां तक कि हमारे देश में जहां आज यह मुद्दा महज़ राजनैतिक स्वार्थ के लिए खासतौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस मुद्दे का लाभ उठाने की गरज़ से उठाया जा रहा है, यहां भी देश के मुसलमान इस व्यवस्था अथवा तरीके को पूरी तरह से स्वीकार नहीं करते। मुस्लिम समाज का संभवत: दस प्रतिशत वर्ग भी ऐसा नहीं होगा जो तीन तलाक की व्यवस्था को स्वीकार करता हो अथवा इसपर अमल करता हो। इस मुद्दे पर शोर-शराबा करने और इसकी आड़ में स्वयं को मुस्लिम महिलाओं का शुभचिंतक साबित करने की कोशिश करना महज़ एक ड्रामा तथा पाखंड के सिवा और कुछ नहीं। इस विषय को प्रचारित करना वैसा ही है जैसाकि मुसलमानों द्वारा चार शादियां किया जाना और 40 बच्चे पैदा किया जाना। कुछ बुद्धिमान टीवी एंकर पूरे आत्मविश्वास के साथ अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में भारत में कोई ऐसा मुसलमान नहीं देखा जिसने चार शादियां की हों और उसके 40 बच्चे हों। परंतु इस्लाम धर्म तथा मुसलमानों को बदनाम करने वालों द्वारा इस दुष्प्रचार की आड़ में बहुसंख्य समुदाय में भय फैलाकर वोटों के ध्रुवीकरण का काम बखूबी अंजाम दिया जाता रहा है। तीन तला$क का मुद्दा मुस्लिम समुदाय के अति सीमित वर्ग द्वारा अपनाया जाने वाला उनका आपसी व व्यक्तिगत् मुद्दा है। मुस्लिम उलेमा इस दुवर््यवस्था से निपटने के लिए स्वयं समय-समय पर वार्ताएं करते रहते हैं। वैसे भी इस भोंडेपन के साथ तलाक दिए जाने का जि़क्र कुरान शरीफ से लेकर किसी इस्लामी शरीयत या किसी हदीस में नहीं है। कुछ पुरानी $िफल्मों में तला$क-तला$क-तलाक कहकर तलाक दिए जाने की व्यवस्था को इस्लाम धर्म में स्वीकार्य तला$क व्यवस्था के रूप में प्रचारित ज़रूर कर दिया है।
हालांकि मुस्लिम धर्म के जिस किसी सीमित वर्ग में इस प्रकार से तलाक दिए जाने का चलन है निश्चित रूप से वह एक सामाजिक बुराई है तथा इस प्रकार तलाक दिए जाने से उन मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन भी होता है जो इससे प्रभावित होती हैं। परंतु इस विषय को उछाल कर स्वयं को महिलाओं का मसीहा बना कर पेश करना या इसकी आड़ में समान नागरिक संहिता का रास्ता तय करने जैसे अपने राजनैतिक एजेंडे पर चलने की कोशिश करना $कतई मुनासिब नहीं है। यदि इसे सामाजिक बुराई के रूप में देखा जाए तो ऐसी सैकड़ों सामाजिक बुराईयां अन्य धर्मों में भी पाई जाती हैं। मिसाल के तौर पर अक्सर यह खबरें सुनने को मिलती हैं कि जाति विशेष के लोगों का मंदिरों में प्रवेश वर्जित है। लिंग विशेष के लोग अमुक मंदिर में प्रवेश नहीं पा सकते। जाति विशेष के लोग अमुक कुंए से पानी नहीं ले सकते। जाति विशेष के लोग अपनी शादी में घोड़ी पर बैठने का अधिकार नहीं रखते। यहां तक कि कई जगह उन्हें चारपाई कुर्सी अथवा किसी भी ऊंची जगह पर बैठने नहीं दिया जाता। और यदि यह लोग सहस्त्राब्दियों से चली आ रही इन त्रासदीपूर्ण दुवर््यवस्थाओं का विरोध करते हैं या इसकी अनदेखी करने की कोशिश करते हैं तो उन्हें अपमानित होना पड़ता है और कई जगह हिंसा का शिकार भी होना पड़ता है। आज देश की सबसे पहली ज़रूरत यह है कि इस सामाजिक भेदभाव को मिटाया जाए। आज हमारे देश में $गरीब व असहाय महिलाओं को दबंगों द्वारा कभी उसकी संपत्ति पर $कब्ज़ा करने के लिए तो कभी उससे जातिगत रंजिश की वजह से उसे चुड़ैल बताकर पीटा जाता है,उसे निर्वस्त्र कर उसी के गांव मोहल्ले में घुमाया जाता है, उसके बाल मूंड दिए जाते हैं तथा मुंह काला कर दिया जाता है। यहां तक कि उसकी हत्या तक कर दी जाती है। आज तक किसी राजनेता द्वारा इस विषय के विरुद्ध किसी प्रकार का आंदोलन चलाने या इस व्यवस्था का सार्वजनिक विरोध किए जाने की $खबर नहीं सुनाई दी। क्या यह विषय तीन तला$क पर पाखंड किए जाने से ज़्यादा ज़रूरी व समाज के लिए हितकारी विषय नहीं है?
आज जो लेाग मुस्लिम महिलाओं के शुभचिंतक बनकर तीन तला$क के मुद्दे को देश का सबसे ज्वलंतशील मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें सांप्रदायिक दंगों के समय मुस्लिम महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर भी नज़र डालने की ज़रूरत है। देश में जब भी सांप्रदायिकता की आंधी चलती है और महिलाओं के यही ढोंगी शुभचिंतक इस काली आंधी को हवा देते हैं उस दौरान इस त्रासदी का सबसे बड़ा शिकार महिलाओं को ही होना पड़ता है। यहां अब यह दोहराने की आवश्यकता नहीं कि 1984 के सिख विरोधी दंगों तथा 2002 के गुजरात के दंगों में महिलाओं पर आ$िखर कौन सा ज़ुल्म नहीं ढाया गया। गर्भवती महिलाओं के साथ बलात्कार से लेकर उनका पेट फाडऩे तक क्या कुछ नहीं किया गया? हद तो यह है कि अभी पिछले दिनों मेवात क्षेत्र में एक मुस्लिम परिवार के साथ घटी सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री इस घटना को छोटी-मोटी घटना बताते सुने गए। ऐसी घटनाओं के समय महिलाओं के हित चिंतक आ$िखर कहां मुंह छिपाकर बैठे रहते हैं। अभी कुछ समय पूर्व जब शनि शिंगणापुर के मंदिर में प्रवेश करने हेतु तृप्ति देसाई द्वारा आंदोलन चलाया गया था तो जो आज स्वयं को महिलाओं का हितैषी बताकर उनके अधिकारों की लड़ाई लडऩे की बात कह रहा है इसी वर्ग के लोग देसाई का यह कहकर विरोध कर रहे थे कि वह धर्मविरोधी है और हमारे प्राचीन धार्मिक परंपराओं का निरादर कर रही है। और जब कुछ नहीं बन पड़ा तो उसे यह कहने लगे कि वह कांग्रेस की एजेंट है। देसाई पर अंतिम प्रहार यह कहकर किया गया कि शनि मंदिर में महिलाओं के जाने की जि़द करने वाली यह महिला, महिलाओं के लिए प्रतिबंधित दरगाहों में महिलाओं के प्रवेश के लिए आंदोलन क्यों नहीं चलाती? जबकि देसाई ने बाद में हाजी अली में महिलाओं के प्रवेश को लेकर आंदोलन भी चलाया और पिछले दिनों अदालत ने हाजी अली की दरगाह में महिलाओं को प्रवेश करने की इजाज़त भी दे दी।
बड़े अफसोस की बात है कि जब चुनाव सिर पर मंडराने लगते हैं उसी समय शातिर राजनेता जो जनता के बीच अपने किए गए वादों को लेकर उन्हें मुंह दिखाने लायक नहीं रहते वे इसी प्रकार के भावनात्मक मुद्दे तलाश करते हैं। कभी मंदिर, कभी मस्जिद, कभी धर्म-जाति, कभी आरक्षण का लॉली पॉप कभी गाय तो कभी गंगा, कभी धर्म विशेष की बढ़ती जनसंख्या का भय तो कभी सेना की कारगुज़ारियों का श्रेय लेने की कोशिश गोया इनमें से कोई भी मुद्दा ऐसा नहीं होता जो सीधेतौर पर आम जनता के रोटी-कपड़ा और मकान से जुड़ा मुद्दा हो। तीन तला$क का मुद्दा भी एक ऐसा ही भावनात्मक मुद्दा है जो उत्तर प्रदेश में चुनावी वातावरण में जानबूझ कर उछाला गया है। अब यह आम मतदाताओं को समझना है कि वह राजनेताओं के इस प्रकार के किसी भी झांसे में आने के बजाए उनसे सीधेतौर पर उनके द्वारा पिछले चुनाव में किए गए वादों को याद दिलाए। और उनसे पूछे कि आ$िखर देश में मंहगाई कम क्यों नहीं हुई? बेरोज़गारी दूर क्यों नहीं हो रही है? विदेशों में जमा काला धन वापस क्यों नहीं आ पा रहा है? हमारे खातों में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपये क्यों नहीं जमा हो रहे हैं? सबका साथ सबका विकास का नारा देकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार सबके विकास की चिंता करने के बजाए केवल कारपोरेट जगत के लोगों के विकास की ही चिंता में क्यों लगी हुई है? गत् दो वर्षों में देश में किसानों द्वारा रिकॉर्ड स्तर पर आत्महत्याएं क्यों की गईं? क्या वजह है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में विजय माल्या जैसा अरबों रुपये गबन करने वाले व्यक्ति को तो फरार होने का मौका दे दिया जाता है जबकि एक साधारण गरीब या किसान कजऱ्दार जेल में ठूंस दिया जाता है? यह हैं तीन तला$क से कहीं अधिक ज्वलंतशील मुद्दे जिनपर राजनेताओं को विचार करना चाहिए।

khoob sahi bat ki hai aap ne..........
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