- प्रभुनाथ शुक्ल/ राजनीतिक लिहाज से उत्तर प्रदेश की एक अलग पहचान है। कहा जाता है कि दल्ली की तख्त पर कौन विराजमान होगा और सत्ता का ताज किसके सिर बंधेगा यह यूपी तय करता है। लेकिन राज्य की सत्ताधारी दल समाजवादी पाटी में मचे आंतरिक घमासान ने राजनीतिक संकट पैदा कर दिया है। बाप-बेटे और चाचा-भतीजे के साथ भाइयों के बीच सत्ता और उत्तराधिकार का संकट सैफइ से सीधे लखनउ की सड़कों पर नूरा कुश्ती में बदल गया है। राज्य में लोकतंत्र और सरकार मजाक बन गयी है। परिवारवाद की जंग लोकतांत्रिक व्यवस्था, संविधान और राजनीति का गलाघोंट दिया। इसके बाद भी संवैधानिक व्यवस्था में गणितीय आंकड़े के चलते लोकतंत्र और उसकी रक्षा को संरक्षित करने वाली संस्थाएं इस संकट पर मौन हैं। जमीनी हकीकत यही है कि यूपी में सरकार और संविधान नाम की कोइ्र चीन नहीं रह गयी है। लोकतंत्र यहां परिवारवाद की परिधी में उलझ मजाक बन गया है। हलांकि केंद्र सरकार और प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक पूरे घटनाक्रम पर निगाह गड़ाए हैं।
राज्यपाल ने सीएम अखिलेश यादव को बुलाकार पिछले दिनों सरकार की स्थिति का आंकलन भी किया। हालंाकि राज्य में राजनीतिक संकट से इनकार नहीं किया जा सकता। समाजवादी इसे घर और परिवार को झगड़ा मान भले ही अपने मुंह पर पट्टी बांध लें लेकिन यह संकट अब घर की चाहारदीवारी से बाहर निकल चुका है। यह यूपी की राजनीति के लिए सुखद नहीं है। क्योंकि राज्य में समाजवादी पाटी्र की अहमियत को झुठलाया नहीं जा सकता है। लेकिन परिवार की लड़ाइ्र में बिखरती समाजवादी पाटी का सीधा लाभ भाजपा उठाएगी। क्योंकि भाजपा लंबे समय से राज्य की सत्ता से बाहर है। राममंदिर आंदोलन के बाद भाजपा गायब है। प्रदेश भाजपा नए सिरे से पैर जमाना चाहती है। इस झगड़े का उसे निश्चित तौर लाभ मिलेगा। चुनाव नजदीक आते भारी संख्या में दलबदल देखने को मिल सकता है।सपा का टूटना और बिखरना गैर भाजपाइ दलों के लिए भी शुभ संकेत नहीं है, उस स्थिति में जब राज्य में चुनाव करीब हो और सेक्युलर दलों के एका यानी महागठबंधन की बात की जा रही हो। लेकिन लोहियाबाद पर परिवारवाद और उत्तराधिकार की लाड़ाइ्र भारी पड़ती दिखती है। सपा को सुरक्षित रखने की मुलायम सिंह की पहल रंगलाती नहीं दिखती है। इसकी जड़ भी मुलायम सिंह यादव है। शिवपाल सिंह तो केवल मोहरे हैं। मुलायमसिंह यादव उन्हें आगे कर अपनी शातिर चालों को कामयाब करना चाहते हथे लेकिन मुख्यमंत्री बेटे की चाल के आगे राजनीतिक अखांडे में पिता खेत होते दिखते हैं। इस लड़ाइ्र में अखिलेश यादव एक नयी सोच और उम्मीद के साथ युवाओं के बीच उभरे हैं। राज्य के विकास में उनकी उपलब्धियों को भुलाया नहीं जा सकता है।
सीएम अखिलेश के बयान से अमरसिंह बेहद आहत हैं। दलाल परिभाषित किए जाने पर उन्हें दुःख भी हैं। लेकिन मुलायम भक्ति के लिए मान अपना कोइ्र मायने नहीं रखता है। हालांकि सीएम अखिलेश कल यह एलान किया है कि अगली सरकार में वे ही मुख्यमंत्री होंगे और छठवां बजट वहीं पेश करेंगे। लेकिन यह तो वक्त बताएगा।समाजवादी पाटी के थिंक टैंक कहे जाने वाले और सीएम के करीबी चाचा रामगोपाल यादव को पाटी्र से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। मुलायम सिंह कह चुके हैं कि उनकी कोइ अहमियत नहीं है। इससे यह साफ जाहिर होता है कि समाजवाद में परिवारवाद का झगड़ा अब थमने वाला नहीं है। पाटी को टूटने से कोइ रोक नहीं सकता है आज नहीं को कल यह होना होना ही है। क्योंकि अखिलेश को कभी खुल कर काम नहीं करने दिया गया। विपक्ष ने उन्हें रिमोट कंटोल सीएम बताया। पिता मुलायमसिंह यादव समय-समय पर उन्हें कानून व्यवस्था और गुंडइ को लेकर अपमानित करते रहे। वह फोड़ा अब फट गया है। राज्य में सपा का थोक वोटबैंक मुस्लिम इस घटना क्रम से बेहद डरा हुआ है। उसके सामने अब विकल्प नहीं दिख रहा है। वह सपा से टूट कर कांग्रेस और बसपा की तरफ भी जा सकता है। इसका खुलासा प्रदेश के काबीना मंत्री आजम खां अपने पत्र बम में कर चुके हैं। लेकिन अगर सपा अपने बिखराव को रोक नहीं पाती है तो इसका साीधा लाभ भाजपा को होगा। यूपी की राजनीति का दो दशकों को इतिहास देखा जाय तो जय पराजय के मतों का जो अंतर बहुत अधिक नहीं रहा है। सिर्फ तीन से चार फीसदी वोटों के खींसकने से सत्ता फिसलती दिखती है।
2002 से 2012 के आम चुनावों में यही स्थिति देखी गयी। 2007 में बसपा को तकरीबन 29 फीसदी वोट मिले वहीं सपा को 26 फीसदी। जबकि 2012 में समाजवादी बसपा को पराजित कर दोबारा जब सत्ता में आयी तो उसे लगभग 29 फीसदी वोट हासिल हुए जबकि बसपा को 26 फीसदी और भाजपा को 15 फीसदी वोट मिले। इससे यह साबित होता है कि अगर अगड़ी जातियों से कांग्रेस सिर्फ पांच फीसदी वोट खींचने में कामयाब होती है तो वह सपा और बसपा जैसे दलों के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। लेकिन अगर महागठबंधन की बात बन जाती है तो सभी के हित में होगा। सपा में अगर यही हालात बने रहे तो सीधी लड़ाइ भाजपा और बसपा के बीच दिखती है। अगर अल्पसंख्यक मतों को रुझान अपनी तरफ करने में मायावती कामयाब हुइ तो राज्य के सियासी हालात की तस्बीर दूसरी होगी। 18 फीसदी अगड़ी जातियों में ब्राहम्णों की संख्या 11 फीसदी है। जबकि राज्य में ठाकुर आठ फीसदी हैं। राज्य की 403 विस सीटों में तकरीबन 125 सीटें इस तरह की हैं जहां अगड़ी जातियों का वोट नया गुल खिला सकता है। प्रदेश के 39 फीसदी ओबीसी मतदाता हैं। जबकि 18 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं पर पकड़ बनाने के कांग्रेस, बसपा और सपा को लडना होगा। राज्य में कांग्रेस उस स्थिति में अभी नहीं दिखती है। राहुल गांधी की खाट पंचायत का बहुत बड़ा असर नहीं दिखता है। हलांकि कांग्रेस ने शीला दीक्षित जैसे ब्राहमण चेहरे को लाकर पीके फामूले पर नया दांव खेला है। लेकिन एक ब्राहमण चेहरा कांग्रेस का दामन छोड़ भाजपा को गले लगा लिया है। बिहार की तज पर अगर सभी सेक्युलर दलों के बीच महागठबंधन की बात बन जाती है तो भाजपा के लिए इसका मुकाबला आसान नहीं होगा। अजीत सिंह भी महागठबंधन की बात कर चुके हैं। कांग्रेस के नेताओं से भी बात करने का एलान किया गया है। क्योंकि राज्य में समान विचाराधारा वालों दलों को सबसे अधिक खतरा भाजपा से है। हलांकि इस तरह के महागठबंधन बहुत कामयाब नहीं होते हैं। लेकिन गठबंधन आज की राजनीति की विवसता भी है।
Prabhu nath shukla
utter Pradesh
mo-892400544




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