शनिवार, 24 सितंबर 2016

क्या-क्या न सहे हमने सितम अखबार की ख़ातिर

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ किसी भी क्षेत्र में दीर्घकालिक सेवा देने वालों को सम्मानित किए जाने की परम्परा रही है, परन्तु मेरे साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ- यह बात अवश्य ही मुझे सालती है। मैं उन सम्पादकों, सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों को मन ही मन भला-बुरा कहने लगता हूँ जिन्होंने मुझे हमेशा नजरन्दाज किया।
बताना चाहता हूँ कि मीडिया क्षेत्र में ट्रेडिल मशीनों से लेकर वेब ऑफसेट के युग तक मैंने वह सभी कार्य किया है जिसे करने में आज के कलमकार शर्म महसूस करते हैं। मसलन मैंने समाचार संकलन से लेकर प्रिटिंग मशीनों में तेल डालने व अखबार बेंचने तक का काम करने के साथ-साथ उन्हें अपने हाथों से संचालित किया है। बावजूद इसके मुझे किसी भी सम्पादक/प्रकाशक ने सम्मानित करने की जहमत नहीं उठाया।
उम्र के 65 बसन्त देखने के बाद जब मैं सिंहावलोकन करता हूँ तब मेरे शरीर में एक अजीब सा दर्द होने लगता है। संवाद संकलन से लेकर प्रकाशित संवाद को जन-जन तक पहुँचाने के लिए स्वयं द्वारा अखबार विक्रय किया जाना कितना सुखद अनुभूति कराता है शायद यह बात वर्तमान पीढ़ी के कलमकार नहीं समझ सकते।
माना कि इस कार्य को करने की एवज में मेरे हाथ पर सम्पादक/प्रकाशकों ने एक चवन्नी तक नहीं रखा था लेकिन संवाददाता/लेखक का परिचय-पत्र थमाकर मुँह बन्द कर दिया था। उनका कहना होता था कि अब जब मुझे पत्रकार/संवाददाता का तमगा दे दिया है तब उसी को माध्यम बनाकर धनोपार्जन करो।
मैंने उनकी नसीहत कभी नहीं स्वीकारा था, और एक निष्ठावान, समर्पित पत्रकार की तरह कार्य करता रहा। मैं उनके द्वारा तत्समय किया जाने वाला शोषण इस समय भली-भाँति महसूस करने लगा हूँ। बहरहाल अब मैंने अपने आप को प्रिण्ट मीडिया से असम्बद्ध कर लिया है और रेनबोन्यूज नामक वेब पोर्टल का संचालन करके उसी में कभी-कभार लिख दिया करता हूँ। मैं अपने को श्रेष्ठ या फिर सर्वश्रेष्ठ नहीं कहता, लेकिन इतना तो कहूँगा कि मैं मीडिया जगत में ‘वरिष्ठता क्रम’ में अवश्य आता हूँ।
आज कल के लौंडे जिन्हें लिखने-पढ़ने का सऊर नहीं जब किसी संगठन द्वारा सम्मानित किये जाते हैं तब मेरे अन्दर का वरिष्ठ पत्रकार भड़क उठता है- जब सोचता हूँ कि ऐसा क्यों हो रहा है तब एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि यह सब स्वयं द्वारा प्रायोजित करके ये लोग सम्मान पाने का प्रचार कर रहे हैं।
यही सब सोचकर चुप्पी साध लेता हूँ। एक बात और मैं वह कर भी नहीं पाऊँगा जो वह लोग कर रहे हैं। मतलब यह कि ‘मस्काबाजी’ मुझे आती ही नहीं और जो लोग ऐसा नहीं करते हैं वे सम्मान के पात्र भी नहीं होते हैं। खैर छोड़िए यह मेरी अपनी सोच है, आप क्यों डिस्टर्ब होंगे, आप तो एक निपुण नवनीत लेपक हैं और सम्मान पा रहे हैं।  

-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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